Sunday, 3 January 2016

क्यूँ होता है ऐसा पता नहीं
मगर ऐसा होता है अक्सर
ख्यालों में खंडरात से उफन आते हैं
फ़ैल जाते हैं ज़हन के आरपार 
जर्जर इमारतों के लैंडस्केप
अध्-मिटे हरफों में से झांकती हैं
कुछ बोदी सी इबारतें
किसने किसके लिए
क्या लिखा है
पढ़ा नहीं जाता
(रवायतों की लिपि
पढ़ी नहीं जाती मुझसे )
ख़ाबों के अन्दर
बवंडर से उठते है
तो मेरी नींदे टूट जातीं हैं
और ऊँगली सी
छूट जाती है ख़ाबों की
फिर कई कई दिन
टूटी नींदों के सहरा पे
अधपक्के ख़ाबों की
रेत सी सूखती रहती है
जिस पे हर लम्हा
नंगे पांव चलता है ज़ालिम
तफरीह सी करता हुआ
और
मैं सारा दिन
गीली आँखों में
दिन कटी करता हूँ
क्यूँ होता है ऐसा पता नहीं
मगर ऐसा होता है अक्सर...

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