हवाओं से उड़ते हैं
पानी से बहते हैं
किसी से कहना मत
जनाब हम तो
आवारगी में रहते हैं
रोकना क्यूँ किस लिए
टिकना नहीं जब नसीब में
बेचैनियाँ जो बैठीं हैं
इस कद्र तरतीब में
ज़हन से लिपटा पड़ा है
इक्क सुनसान सा ख्लाह
कोहरा सा जमा रहता है
रूहों में
तिलभर भी नहीं जगहा
तेरे रब्तों की
तेरे रिश्तों की
दुहाई न देना
कम ही सुनते हैं
जनाब हम तो
आवारगी में रहतें हैं...
निकल गये तो
लौटना नहीं आता
हर रुत्त में
मौसमों की मानिंद
बरसना नहीं आता
तफरीह सी है ज़ालिम
हर वक्त ख्यालों में
जो चाहती है वही करतें
हैं
जनाब हम तो
आवारगी में रहतें हैं...
No comments:
Post a Comment