Sunday, 3 January 2016

हवाओं से उड़ते हैं
पानी  से बहते हैं
किसी से कहना मत
जनाब हम तो
आवारगी में रहते हैं

रोकना क्यूँ किस लिए
टिकना नहीं जब नसीब में
बेचैनियाँ जो बैठीं हैं
इस कद्र तरतीब में
ज़हन से लिपटा पड़ा है
इक्क सुनसान सा  ख्लाह 
कोहरा सा जमा रहता है
रूहों में
तिलभर भी नहीं जगहा
तेरे रब्तों की
तेरे रिश्तों की
दुहाई न देना
कम ही सुनते हैं
जनाब हम तो
आवारगी में रहतें हैं...

निकल गये तो
लौटना नहीं आता
हर रुत्त में
मौसमों की मानिंद
बरसना नहीं आता
तफरीह सी है ज़ालिम
हर वक्त ख्यालों  में  
जो चाहती है वही करतें हैं
जनाब हम तो
आवारगी में रहतें हैं...


No comments:

Post a Comment