आँख ही नहीं ख़ुलती
दिन भी निकलता है
चाय कि चुस्की के साथ.....
रूहें जगती हैं
किताबें खुलती हैं
ज़हन में ख्याल
और ख्यालों में लांघ आते हैं
सार्त्र , कामू , काफ्का
पाश , पचौरी , पिंटर
कितने ही हमख्याल
आ बैठते हैं सुबहा-सुबहा
ऊंघती सी ,आँखे मलती
सुरमई सी साड़ी पहने
कितनी ही लकीरें
उतरतीं हैं कागज़ों पर
आहिस्ता से
भरा-भरा सा हो जाता है
सफहों का आँगन
महक सा उठता है वज़ूद
मुक्मल सा हो जाता है
जीने का मक़सद
इक नज़्म के साथ
दिन भी निकलता है
चाय कि चुस्की के साथ.....
रूहें जगती हैं
किताबें खुलती हैं
ज़हन में ख्याल
और ख्यालों में लांघ आते हैं
सार्त्र , कामू , काफ्का
पाश , पचौरी , पिंटर
कितने ही हमख्याल
आ बैठते हैं सुबहा-सुबहा
ऊंघती सी ,आँखे मलती
सुरमई सी साड़ी पहने
कितनी ही लकीरें
उतरतीं हैं कागज़ों पर
आहिस्ता से
भरा-भरा सा हो जाता है
सफहों का आँगन
महक सा उठता है वज़ूद
मुक्मल सा हो जाता है
जीने का मक़सद
इक नज़्म के साथ
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